बसंत की स्नेहिल कामनाओं सहित -
प्रेम -पुष्प, सुगंध की तलाश, बसंत |
बासंती,गुलमोहर,पलाश बसंत|
पल-पल पाते विस्तार प्रकृति के रंग,
स्वच्छंद विचरता मोहपाश, बसंत |
धुप - छाँव, सुख दुःख गतिशील सदा,
मधुबन को लौटाता विश्वास ,बसंत |
अलंकृत धरा दहलीज फागुन सत्कार ,
कण-कण प्रकृति में प्रतीत श्वास बसंत |
Sunday, February 13, 2011
Tuesday, December 7, 2010
Wednesday, January 6, 2010
Thursday, September 3, 2009
बाज़ार
उठती है निगाह जिधर बाज़ार नज़र आता है |
कोई बिकता हुआ कोई खरीदार नज़र आता है |
सिर्फ जरूरतों के उसूल पर जीता है जमाना ,
जो न किसी काम का वो बेकार नज़र आता है |
आते-जाते हर शख्स की है निगाह मुझ पर,
शायद मुझमे कोई कारोबार नज़र आता है |
ख्वाहिशो के दश्त में हर आदमी गुम है,
रूह है गिरवी जेबों में उधार नज़र आता है |
कोई बिकता हुआ कोई खरीदार नज़र आता है |
सिर्फ जरूरतों के उसूल पर जीता है जमाना ,
जो न किसी काम का वो बेकार नज़र आता है |
आते-जाते हर शख्स की है निगाह मुझ पर,
शायद मुझमे कोई कारोबार नज़र आता है |
ख्वाहिशो के दश्त में हर आदमी गुम है,
रूह है गिरवी जेबों में उधार नज़र आता है |
Thursday, February 5, 2009
हवाला
घर में उन चारों के अतिरिक्त
रहती है एक - डायरी |
जिस में मिलता है -रोज की सब्जी की कीमते \
\दूध का हिसाब\
परचूनी क्रय \माँ की गठिया की दवाई का मूल्य,
और पिताजी की ऐनक की मरम्मत का खर्च का हिसाब
डायरी के पन्ने
महीने भर के खर्च का हिसाब
रखते है बड़ी सावधानी से,
फ़िर भी न जाने कैसे ? उसमे
नई साडीयो की सिलवटे\
लिपस्टिक के शेड्स\मंहगे क्रीमों की तीक्ष्ण गंध
सिगरेट के छल्लों और सप्ताह के आख़िर मे
रेस्तरा का बिल\
मल्टीप्लेक्स के दो आधे टिकटों सहित नदारद है ,
घर की कोई डायरी
इन का हवाला नही देती !
रहती है एक - डायरी |
जिस में मिलता है -रोज की सब्जी की कीमते \
\दूध का हिसाब\
परचूनी क्रय \माँ की गठिया की दवाई का मूल्य,
और पिताजी की ऐनक की मरम्मत का खर्च का हिसाब
डायरी के पन्ने
महीने भर के खर्च का हिसाब
रखते है बड़ी सावधानी से,
फ़िर भी न जाने कैसे ? उसमे
नई साडीयो की सिलवटे\
लिपस्टिक के शेड्स\मंहगे क्रीमों की तीक्ष्ण गंध
सिगरेट के छल्लों और सप्ताह के आख़िर मे
रेस्तरा का बिल\
मल्टीप्लेक्स के दो आधे टिकटों सहित नदारद है ,
घर की कोई डायरी
इन का हवाला नही देती !
Friday, January 2, 2009
मैने तेरे ही ख्यालों की परवाह की है
हमने कब रिवाजों की परवाह की है
बस वक्त के इशारो की परवाह की है |
जिनके सिरों पर अब बाम नही ,
किसने ऐसी दीवारों की परवाह की है |
वैसे तो था नही मै तेरा मकरूज़ ,
फ़िर भी तेरे तकाजों की परवाह की है |
ये अंधेरे ये बेबसी मेरे नही है
मैने तेरे ही ख्यालों की परवाह की है |
बस वक्त के इशारो की परवाह की है |
जिनके सिरों पर अब बाम नही ,
किसने ऐसी दीवारों की परवाह की है |
वैसे तो था नही मै तेरा मकरूज़ ,
फ़िर भी तेरे तकाजों की परवाह की है |
ये अंधेरे ये बेबसी मेरे नही है
मैने तेरे ही ख्यालों की परवाह की है |
Saturday, December 6, 2008
'सब-वे' के नीचे

आफिस से लौटते हुवे दोनों -
संतप्त थे देश के
हालतों पर
आर्थिक मंदी \ आतंकवाद
उन दोनों की बातचित का सिलसिला
'सब-वे' से गुजरते हुवे पुरे शबाब पर था तभी...
किसी ने शर्ट का निचला हिस्सा पकड़कर
छोड़ दिया ...
उनमे से एक ने चौकते हुवे पलटकर देखा ,
आठ या दस बरस का लड़का
मैले-फटे कपडों मे खड़ा था हाथ फैलाये |
तभी दूसरा कर्म-प्रधान बोला -" काम करेगा ?"
"चल कंही लगवा देता हूँ |" लड़का बस देखता भर रहा |
पहले ने इस पर प्रतिक्रिया दी - "छोड़ना यार !" ये लोग नही सुधरेगे |
धंधा बना रखा है|
" चल!पहले ही लेट है " |
लड़का पीछे छूटता गया उनसे |
थोडी देर के बाद ..
शराब की दुकान के सामने ठेले पर से
मुट्ठी भर पकौडी उठाकर
यही आठ या दस बरस का लड़का
भाग खड़ा हुआ ..
अभी खाने को मुंह खोला ही था की- एक जोरदार मुक्का पीठ पर पड़ा |
ठेले का मालिक था ..
माँ - भेन एक करता हुआ
ले गया मसली हुई पकौडियां ..अपनी दुकान चलाने ..|
तब- तक उधर वो दोनों हाथो
की सिगरेट बुझा पहुँच गए,गंतव्य तक
उनकी बातों का विषय
अब है - कौन सा ब्रांड ? कितनी मात्रा ?
साथ में खाने को क्या -क्या ?
...इधर ये लड़का बांह से आखें पौछ्ता हुआ,
रेड-लाईट पर आ खड़ा है |
दो रास्ते है उसके आगे पीछे
एक - वही ठेले के पास |
दूसरा- 'सब-वे' के नीचे |
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