Tuesday, March 8, 2011

जिसने सच कहा

जिसने सच कहा उसका बुरा हाल, होगा |
अब इस माहौल में जीना मुहाल, होगा |

दोस्त सच्चे हो तो आईना किस लिए ,
साथ अपने इस सामान पर मलाल, होगा |

है अपनी सूरते -रंग अपने ही हाथों में
वरना, तेरा अक्स तेरे हाथों बेहाल, होगा |

जिस शफ़क ने उठाया झूठ से पर्दा ,
वजूद पर उस के ही अब सवाल, होगा |

Sunday, February 13, 2011

बसंत की स्नेहिल कामनाओं सहित -

प्रेम -पुष्प, सुगंध की तलाश, बसंत |
बासंती,गुलमोहर,पलाश बसंत|

पल-पल पाते विस्तार प्रकृति के रंग,
स्वच्छंद विचरता मोहपाश, बसंत |

धुप - छाँव, सुख दुःख गतिशील सदा,
मधुबन को लौटाता विश्वास ,बसंत |

अलंकृत धरा दहलीज फागुन सत्कार ,
कण-कण प्रकृति में प्रतीत श्वास बसंत |

Tuesday, December 7, 2010

तुम को देखे हुवे कितने दिन हुऐ |
कुछ कहे सुने, कितने दिन हुऐ |

छोड गई नदिया सूखे किनारे,
बहता पानी छुवे, कितने दिन हुऐ |

मै अपने बचपन को आवाज़ देता रहा,
माँ के दामन में छुपे, कितने दिन हुऐ |

जी रहे है यूँ लगता है किसी की मर्ज़ी है,
साँसे हाथों से चुने, कितने दिन हुऐ |

Thursday, September 3, 2009

बाज़ार

उठती है निगाह जिधर बाज़ार नज़र आता है |
कोई बिकता हुआ कोई खरीदार नज़र आता है |

सिर्फ जरूरतों के उसूल पर जीता है जमाना ,
जो न किसी काम का वो बेकार नज़र आता है |

आते-जाते हर शख्स की है निगाह मुझ पर,
शायद मुझमे कोई कारोबार नज़र आता है |

ख्वाहिशो के दश्त में हर आदमी गुम है,
रूह है गिरवी जेबों में उधार नज़र आता है |

Thursday, February 5, 2009

हवाला

घर में उन चारों के अतिरिक्त
रहती है एक - डायरी |
जिस में मिलता है -रोज की सब्जी की कीमते \
\दूध का हिसाब\
परचूनी क्रय \माँ की गठिया की दवाई का मूल्य,
और पिताजी की ऐनक की मरम्मत का खर्च का हिसाब
डायरी के पन्ने
महीने भर के खर्च का हिसाब
रखते है बड़ी सावधानी से,
फ़िर भी न जाने कैसे ? उसमे
नई साडीयो की सिलवटे\
लिपस्टिक के शेड्स\मंहगे क्रीमों की तीक्ष्ण गंध
सिगरेट के छल्लों और सप्ताह के आख़िर मे
रेस्तरा का बिल\
मल्टीप्लेक्स के दो आधे टिकटों सहित नदारद है ,
घर की कोई डायरी
इन का हवाला नही देती !

Friday, January 2, 2009

मैने तेरे ही ख्यालों की परवाह की है

हमने कब रिवाजों की परवाह की है
बस वक्त के इशारो की परवाह की है |

जिनके सिरों पर अब बाम नही ,
किसने ऐसी दीवारों की परवाह की है |

वैसे तो था नही मै तेरा मकरूज़ ,
फ़िर भी तेरे तकाजों की परवाह की है |

ये अंधेरे ये बेबसी मेरे नही है
मैने तेरे ही ख्यालों की परवाह की है |