Thursday, September 25, 2008


मैंने इंतजार किया ...
अपनी सीमाओं से निकल कर तुम आ जाओ,
मेरी सरहदों में
मैंने इंतजार किया -
आँगन की चादर भर धूप दहलीज पार करे
मेरे कमरे में बिछे
अपने परिवेश से लड़ते हुवे ..हाथ तुमने बढाया था मुझ तक
तब भी शायद वीक्षक होकर देखता रहा तुम्हारा
सामर्थ........
अंह का सचेतन पाषाण बना
पूजे जाने की करता रहा कामना
वक्त का काफिला जब गुजर गया तेरे-मेरे दरमिया ॥
फिर ना उष्ण स्पर्श पाया,
ना ग्रीष्म मे तुम्हारी छाया
अब अक्सर सीधी निर्जन सड़क पर ठिठक जाता हूँ ॥
पदचापों से उठते है एक ही सवाल बार-बार
मैंने इंतजार क्यों किया ?

3 comments:

manvinder bhimber said...

मैंने इंतजार किया ...
अपनी सीमाओं से निकल कर तुम आ जाओ,
मेरी सरहदों में
मैंने इंतजार किया -
आँगन की चादर भर धूप दहलीज पार करे
मेरे कमरे में बिछे
अपने परिवेश से लड़ते हुवे ..हाथ तुमने बढाया था मुझ तक
तब भी शायद वीक्षक होकर देखता रहा तुम्हारा
bahut hi sunder

Anwar Qureshi said...

बहुत अच्छा लिखा है आप ने ..बधाई

मृत्युंजय said...

शुक्रिया दोस्तों |